हल्दी की खेती कैसे होती है हल्दी की खेती की पूरी जानकारी – turmeric farming in hindi-

266

मसाले एवं रंग के रूप में कम आने के अलावा औषधि के रूप में भी इसका अत्यधिक महत्व है सुखी एवं कच्ची हल्दी को त्वचा के रोगों तथा कटे हुए भागो पर लगाने के लिए प्रयोग किया जाता है भीतरी रोगों के लिए यह एक उत्तेजक एवं सुगन्धित टोनिक का कार्य करता है हिंदुवो में हल्दी का उपयोग धार्मिक अवसरों में भी किया जाता है यह पायरिया नाशक नेत्ररोग चर्मरोग नाशक रक्त शोधक पेट दर्द निवारक होने के साथ साथ अन्य कई रोगों में एंटीसेप्टिक के रूप में इसका उपयोग होता है वर्तमान में इससे अनेक औषिधिय तेल मलहम तथा अनेक आयुर्वेदिक तथा होम्योपैथिक दवाओं का निर्माण होता है गांठो में पीला रंग उसमे पाए जाने वाले रसायन करक्यूमिन के कारण होता है भारत में हल्दी की खेती मुख्यता महारास्ट कर्नाटक असम मध्यप्रदेश बिहार उदिशा आँध्रप्रदेश तथा तमिलनाडु में किया जाता है हल्दी का मूलस्थान भारत ही मन जाता है 

हल्दी की खेती के लिए उपयुक्त किस्मे – varieties for turmeric farming in hindi-

हल्दी की किस्मे उगाये जाने वाले समय के अनुसार तीन प्रकार की है-

haldi हल्दी की अल्पकालीन किस्मे-

ये किस्मे सात महीने में तैयार हो जाती है इस वर्ग के अंतर्गत निम्नलिखित किस्मे आती है- अमलापुरम सी. ए.-73 , दिन्द्रोगैमे  सी.ए.-69

हल्दी की दीर्घकालीन किस्मे –

ये किस्मे नो महीने में तैयार हो जाती है इस वर्ग के अंतर्गत निम्नलिखित कीमे आती है – दुग्गिरेला सी.एल.एल.-325, माइद्युकर सी.एल.एल.-327, तेकुर्पेट  सी.एल. एल. -326 , आर्मुर सी.एल.एल. -324

हल्दी की मध्यकालीन किस्मे –

ये किस्मे आत महीने में तैयार हो जाती है  इस वर्ग में निम्नलिखित किस्मे आती है – अमृत पानी कोठापेटा सी.एल.एल. -317 , पी.टी.सी.-8 , पीताम्बरा , कस्तूरी .

हल्दी की खेती के लिए जलवायु कैसी होनी चाहिए-climate for turmeric farming in hindi-

हल्दी की खेती समुद्र तल से औसतन 1300 मीटर की उचाई तक मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रो में होती है इसकी खेती 100 – 250 सेमी वार्षिक वर्षा वाले स्थानों में अच्छी होती है इसकी खेती के लिए बढवार के समय अधिक वर्षा तथा बोआई व्  उगाई के समय कम वर्षा तथा फसल के पकने से एक माह पूर्व सुखा वातावरण उत्तम होता है 

हल्दी की खेती के लिए भूमि कैसी होनी चाहिए एवं भूमि की तैयारी कैसी की जाए – soil and its preparation for turmeric farming-

हल्दी की खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है , किन्तु अच्छे जल निकास वाले मटासी व् डोरसा मिटटी ज्यादा उपयुक्त है जल भराव वाली मृदा इसके लिए उपयुक्त नही है  खेत को जोतकर मिटटी को भुरभुरा कर लेना चाहिए फिर उचित आकर की क्यारियाँ बना लेना चाहिए ज्यादातर 4 x 2 m or 6 x 3 मीटर आकार की क्यारियां उपयुक्त होती है 

हल्दी की फसल में कौन कौन से खाद एवं उर्वरक डालने चाहिए-manures and fertilizers for turmeric farming in hindi –

हल्दी की फसल को खाद की अत्यधिक आवश्यकता होती है  भूमि की तैयारी के समय 300-400 क्विंटल अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर का खाद मिला देना देना चाहिए खेत में जुताई के बाद 30kg nitrogen, 30kg पोटाश , 50kg फास्फोरस मिला देना चाहिए 

हल्दी की खेती के लिए बीज की मात्रा क्या होनी  चाहिए seed rate for turmeric farming in hindi-

प्रति हेक्टेयर बीज प्रक्न्दो 15-18 क्विंटल छोटे आकार के लिए एवं बड़े आकार के लिए 25 क्विंटल बोने के लिए उपयुक्त है 

हल्दी के फसल में बीज को बोने का समय क्या होना चाहिएsowing time for turmeric farming in hindi-

4 मई से 30 जून के मध्य हल्दी की बोआई का उचित समय है 

हल्दी की खेती में बीज प्रक्न्दो का चुनाव व् बोआईselection of rhizomes and sowing in turmeric cultivation in hindi-

प्रकन्द बिना कटे रोगमुक्त तथा स्वस्थ होने चाहिए प्रत्येक प्रकन्द में कम से कम दो आँख अवश्य होने चाहिए तथा उनका औसतन वजन में 25 से 30 ग्राम होना चाहिए बोने से पहले इन प्रक्न्दो को 0.25% एग्लाल या किसी अन्य उपलब्ध बीज उपचार करने वाले रसायन के घोल में 30 मिनट तक  उपचारित करके 30 x 20 सेमी की दुरी में 8- 10 सेमी की गहरायी में लगा देना चाहिए 

हल्दी की फसल में निराई गुडाई एवं मिटटी  चढाना – inter cultural opration and earthing of turmeric farming in hindi-

खेत में तीन चार बार फसल की निराई गुडाई करके खरपतवारो को निकलते रहना चाहिए ताकि गांठो का विक्स अच्छा हो तथा उनका वजन भी अच्छा रहे जिससे पैदावार भी अधिक हो तीन चारबार गुडाई के साथ साथ पोधो में मिटटी भी चढाते रहना चाहिए 

हल्दी के फसल में सिंचाई करने का उपयुक्त  समय कब होना चाहिए -irrigation in turmeric farming in hindi

मार्च अप्रेल में बोई गयी फसल में वर्षा होने तक 3-4 बार सिंचाई करना चाहिए यदि फसल जून माह में बोई गयी है तो 1 से 2 सिंचाई ही काफी होती है वर्षा समाप्त होने के बाद 15 दिन के अंतर पर सिंचाई आवश्यकता अनुसार करना चाहिए 

हल्दी के फसल की खुदाई कब करते है-digging of crop turmeric in hindi

अवधि के अनुसार हल्दी की खुदाई 7 से 10 माह के बाद क्र ली जाती है फसल पककर तैयार होने पर पत्तियां पीली हो जाती है प्रक्न्दो की खुदाई करते समय ध्यान रखे की वह किसी प्रकार क्त न जाये या फर किसी प्रकार की छिलाई न हो 

हल्दी के बीजो का भंडारण कैसे करते है-

1.ढेर लगाकर –

हल्दी को इकट्ठा करके घास फूस में दबाकर चारो तरफ मिटटी का लेप किया जाता है और समय – समय पर ऊपर से गोबर का लेप किया जाता है 

2.गड्ढे में दबाकर-

2  मीटर लम्बे ,2 मीटर चौड़े , 1 मीटर गहरे गड्ढे में रखा जा सकता है 

हल्दी के फसल में उपज कितनी प्राप्त होती है-

हल्दी की उपज, भूमि की उर्वराशक्ति , उगाई जाने वाली किस्म एवं फसल की देखभाल पर निर्भर करती है प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल कच्ची हल्दी और इसके 40-50 क्विंटल सुखी हल्दी प्राप्त होती है 

हल्दी के फसल में लगने वाले रोग -कीट कौन कौन से लगते है –

तना छेदक stem borer-

तने में छिद्र करने वाली कीट दैकोक्रोसिस पंक्तिफ्लिय्स dicocrosis puncteflius से बड़ी हानि होती है यह तने में छिद्र करके अन्दर प्रवेश कर जाती है जिसके कारण तना सुख जाता है 

तना छेदक रोग से रोकथाम –

1.कीट ग्रसित तनो को काटकर नष्ट कर देना चाहिए 

2. 0.03% रोगर अथवा 0.25 फश्फोमिदों के घोल का छिडकाव करना चाहिए 

3. कीट थ्रिप्स फसल की पत्तियों का रस चूसकर पौधो को कमजोर बना देते है इनकी रोकथाम के लिए इन्डोसल्फान 35 ई . सी.2 मिली लीटर या मोनोक्रोतोफोस 2 मिली लीटर प्रतिलीटर पानी में मिलाकर अथवा 10 मिली लीटर daimecron 100 ई.सी. को 10 लीटर पानी में घोलकर छिडकते है  

हल्दी की पत्तियों में होने वाले रोग – पत्तियों में धब्बे leaf spot in turmeric in hindi –

यह रोग phailostikta jinjiberi नामक फफूंदी के कारण होता है पौधो की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है प्रक्न्दो की उपज में  कमी मिलती है 

हल्दी की पत्तियों में होने वाले रोगों की रोकथाम कैसे की जाती है (it’s control)

किसी भी ताम्रयुक्त रसायन का 0.3 % का घोल बनाकर छिडकाव करने से इस रोग की रोकथाम होती है 

एसी ही और जानकारी के लिये हमारे site को visit करे https://kisanhelps.com धन्यवाद