बैगन की खेती कैसे की जाती है कब और की जाती है -Brinjal farming in hindi-

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बैगन का botanical name या होता है -what is botanical name of brinjal-

Solanum melongena बैगन का वानस्पतिक नाम होता है 

बैगन सब्जी एक महत्वपूर्ण फसल है, इसे सभी राज्यों में उगाया जाता है अन्य सब्जियों की तुलना में इसका यातायात आसान है इसमें कार्बोहायड्रेट, प्रोटीन , वसा, खनिज , लवण , और विटामिन ए, बी, सी, काफी मात्रा में पाए जाते है बैगन का उपयोग मधुमेह रोग में किया जाता है इसकी वर्ष में कई  फसल में ली जा सकती है गर्मियों में अन्य सब्जियां , कम मात्रा में उपलब्ध होने के कारण इसकी मांग अधिक हो जाती है इसका पौधा अधिक सहिशुँ होता है  

बैगन की उत्पत्ति कहाँ से हुई है brinjal origin – बैगन की उत्पति भारत और चीन के उष्ण  कटिबंधीय प्रदेशो में मानी जाती है 

बैगन की खेती के लिए जलवायु कैसी होने चाहिए- climate for brinjal farming-

बैगन की खेती के लिए के लिए गर्म और नम जलवायु की आवश्यकता होती है इसकी खेती पैदावार के लिए 15 डिग्री से 25 डीग्री तापमान अच्छा माना जाता है इसकी फसल पर पाले का बुरा असर पड़ता है 15 डीग्री से कम तापक्रम पर फूल आना बंद हो जाते है 25 डीग्री ज्यादा से ज्यादा तापक्रम बढने पर भी फूल नही आते और यदि  आते है तो गिर जाते है बैगन में बीजो का अकुरण 25 डीग्री पर अच्छा होता है 

बैगन की खेती के लिये भूमि कैसी होनी चाहिये-

Soil for brinjal farming-

बैगन सभी प्रकार के भूमि मे उगाया जाता है अच्छी पैदावार लेने के लिये अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि उपयुक्त होती है पौधो की अच्छी वृध्दि के लिये मिट्टी का PH मान 5•5-6•0 के बीच होना चाहिये।

Improved vairieties for brinjal cultivation- बैगन की खेती के लिये उन्नत किसमे कौन कौन सी होती है –

अ- लम्बे फल वाली किसमे – पूसा क्रांती, पूसा पर्पिल लांग, पी एच -4, पूसा अनमोल , पूसा पर्पिल, क्लस्टर,पन्त बैगन, 126-5, पन्त बैगन-61, पंजाब चमकिला,पन्त सम्राट,अकृशील आजाद क्रांती , कल्याणपुर, विजय,कल्याणपुर टा-1,2 इत्यादी है।

ब – गोल फल वाली किस्मे – पूसा पर्पिल, पंजाब बहार,टाईप-3,बी आर 112, पन्त बैगन 91-2, कल्याणपुर टा-4, इत्यादी है।

Hybrid varieties-

एम•एच बी-2, एम एच बी-3, एम एच बी-9,एम ई बी एच-11,एम ई बी एच-16, एम ई बी एच-54, एम एच बी-56 इत्यादी है ।

बैगन की खेती के लिये भूमि की तैयारी कैसे करनी चाहिये-(Soil preparation for brinjal cultivation)-

बैगन की फसल कई महिनो तक खेत मे खडी रहती है , इसलिये खेत की अच्छी तैयारी की आवश्यकता पड़ती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिये। पहली जुताई करने के उपरांत 4-5 जुताई देशी हल से करनी चाहिये। पाटा का उपयोग करके खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिये । भली भांति तैयार तथा समतल की गयी भूमि मे उचित आकार की क्यारिया बना ली जाती है। आखरी जताई के समय 5%aaldrin 20-25 किलोग्राम प्रति hecteyar डालकर मिला दे। एसा करने से पौधो को दीमक और अन्य भूमिगत कीड़ो से होने वाली हानी से बचाया जा सकता है।

बैगन की फसल मे कौन कौन से खाद उर्वरक का उपयोग करना चाहिये अच्छी पैदावार के लिये- manures and fertilizers for brinjal farming-

बैगन की उचित पैदावार के लिये खाद और उर्वरको का प्रयोग बहुत महत्वपुर्ण है। बैगन की अच्छी उपज लेने के लिये निम्नलिखित मात्रा मे प्रति hecteyar खाद व उर्वरक देने चाहिये-

गोबर की खाद-200-250क़्विंटल

नाईट्रोजन-100किलोग्राम

फास्फोरस-50 किलोग्राम

पोटाश-50किलोग्राम

गोबर की सडी हुई खाद तैयार करते समय रोपाई से 20-21 दिन पूर्व डालकर मिट्टी मे अच्छी तरह मिला दे। naitogem की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूर्ण मात्रा पौधे रोपने से पूर्व आखरी जुताई के समय मिट्टी मे मिला दे। शेष आधी naitogen की मात्रा 2 बार मे रोपाई के 30 और 60 दिन बाद tapdresing के रूप मे डाले। ध्यान रहे की उर्वरक पत्तियों पर न पडे।

बैगन की खेती मे पौधे बोने का समय क्या होना चाहिये-( time or sowing)-

बैगन की बोआई वर्ष मे तीन बार की जाती है – जुन-जुलाई, अक्टूबर-नवम्बर, फरवरी-मार्च।

नर्सरी मे बोआई का समय -जुन -जुलाई , अक्तूबर -नवम्बर,फरवरी मार्च,

रोपाई का समय- जुलाई – अगस्त, नवम्बर-दिसम्बर अन्त तक,

फल मिलाने का समय – सितम्बर-अक्तूबर,फरवरी मार्च,जुन जुलाई।

बैगन की खेती मे बीज की मात्रा कितनी होनी चाहिये- (seed rate)-

400 -500 ग्राम बीज प्रति hecteyar उचित होता है बैगन की खेती के लिये। तथा उपज भी अधिक मिलती है।

पौध तैयार करने की विधि-(method of seedling raising)-

जिस खेत मे नर्सरी डालनी हो उसे अच्छी प्रकार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिये।और इसी समय प्रयाप्त मात्रा मे सडी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद मिट्टी मे मिला देते है । इसके बाद बैगन की पौध तैयार करने के लिये 15 सेमी उंची 5×1 मीटर आकार की क़्यरिया बना ले। एक hecteyar मे पौध रोपने के लिये इस प्रकार की लगभग 18-20 क़्यारियो की आवश्यकता पडती है । chhidkawa विधि से बीज बोन हो तो बोआई की सुविधा के लिये बीज मे थोडी सुखी मिट्टी मिलाकर क़्यारियो मे समान रूप से बिखेर दे। यदि बीज पंक्तयों मे बोना है तो 15 सेमी के दुरी पर 1-1 •5 सेमी की गहराई पर बीज बो दे। बीज को हल्की मिट्टी या सडी गोबर की पर्त से ढक दे। दोनो ही विधि मे बोआई के तुरंत बाद हजारे से पानी लगाते रहे। एक सप्ताह बाद बीजो का जमाव शुरु हो जाता है। अंकुरण हो जाने पर घास की परत को हटा दे। पौध 4-6 सप्ताह मे रोपने योग्य हो जाती है ।

बीजोपचार (seed treatment)-

ध्यान रहे की बोने से पूर्व बीज का थीरम या केपटान या सेरेसन(2•5) से अवश्य ही उपचारित कर ले।

बैगन की खेती मे पौध की रोपाई कैसे की जाती है पौध को लगाने का तरीका कैसा होना चाहिये-(Transplanting)-

जब पौधे 10-15 सेमी ऊचे हो जाये तथा उनमे 4-5 पत्तियाँ निकल आये तब उसे रोपाई के लिये प्रयोग करे। पौध बीज बोने के चार सप्ताह बाद रोपाई के लिये तैयार हो जाती है । शीत ऋतु मे अधिक समय मे पौध तैयार होती है । मुख्य खेत मे पौध खुरपी की सहायता से लगायी जाती है। खेत मे रोपाई से पूर्व क़्यारि और सिंचाई के लिये नालियाँ बना ले । रोपाई की दुरी किस्म और उगाने के समय पर निर्भर करती है। तैयार क़्यारियो मे लम्बे फल वाली किस्म के लिये 60 सेमी और गोल फल वाली किस्मो के लिये 75 सेमी की दुरी पर पंक्तिया बना ले और फिर इन पंक्तियो मे 60 सेमी की दुरी पर पौध रोपे।

लम्बे फल वाली किस्म- 60×60 सेमी

गोल फल वाली किस्म- 74×60सेमी

पंजाब बहार, पूसा अनमोल जैसी अधिक उपज देने वाली किस्मो को 90×60 सेमी की दूरि पर प्रतिरोपीत करना चाहिये। रोपाई करते समय रोगी और कमजोर पौधे निकाल दे। रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई कर दे। जो पौध शुरु की अवस्था मे मर जाये उनके स्थान पर नयी पौध रोप दे।

बैगन की फसल मे सिंचाई कब की जाती है सिंचाई का समय क्या होना चाहिये-(Irrigation in brinjal farming)-

पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी आवश्यक है अन

सिंचाई भूमि की किस्म और मौसम पर निर्भर करती है।खरिफ की फसल मे सिंचाई वर्षा पर निर्भर करती है।वर्षा का उचित वितरण होने पर प्राय सिंचाई की आवश्कता नही होती है। गर्मियों मे 7-8 दिन के अन्तर से और सर्दियों मे 10-12 दिन के अन्तर से सिंचाई करने करने की आवश्यकता होती है।

बैगन की फसल को खरपतवार से कैसे बचाते है खरपतवार से बचाने के तरीके- (weed controls)-

बैगन की अधिक उपज लेने के लिये खेत मे उगे खरपतवार को निकालना बहुत आवश्यक है। वर्षाकालीन फसल मे अन्य फसलो की अपेक्षा खरपतवार अधिक पनपते है। इसलिये खरपतवार के उगाने पर प्रारम्भिक अवस्था मे ही इन्हे निकाल दे। वर्षाकालीन फसल मे 3-4 निराई गूडाई और करनी चाहिये।

बैगन की फसल मे फलो की तूडाई कैसे की जाती है,और उपज कितनी होती है-(picking & yield)-

बैगन की फसल की रोपाई के 70-80 दिन बाद फल मिलने शुरु हो जाते है। जब फल बडे हो जाए और उनमे रंग भी आ जाये तब उन्हे तोड़ ले। फलो के तोडने मे देरी करने से फलो का रंग फीका पड़ जाता है, साथ ही फलो मे बीज कड़े हो जाते है। बैगन का फल लगने के 10 दिन बाद तोडने लायक हो जाता है । फलो को तोड़कर छायादार स्थान मे रखे।

बैगन की औसत उपज 200-250 क़्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। पंजाब बहार, पूसा अनमोल , पूसा क्रांती, पन्त बैगन 129-5 जैसी किस्मो की उपज लगभग 400 क़्विंटल प्रति हेक्टेयर हो जाती है।

बैगन के फलो मे लगने वाले कीट कौन कौन से है इन कीटो से फसल मे लगने वाले रोगो व कीटो से नियंत्रण-(Insects and Disease contol)-

1- बैगन का tidda – यह रोग अधिकतर बैगन और आलू को ही लगता है। यह कीड़ा गोल सा तांबे के रंग का काले-काले धब्बो से भरा होता है। यह दो किस्म का होता है-एक के 12 धब्बे तथा दुसरे 28 धब्बे होते है । यह कीड़ा तथा इसकी सूडी पत्तियों की हरयाली को खा जाती हैऔर पत्ता छलनी हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिये प्रती हेक्टेयर 20 किलो बी एच सी 25% का हल्का बुरकाव करना चाहिये।

2- बैगन का तना व फल छेद्क कीट- यह कीड़ा छोटा और गुलाबी रंग का होता है। जबकी पूरे वयस्क पतंगे कारंग स्लेटी एवं उसके पंख सफेद होते है, परो पर गुलाबी भूरे से दाग होते है। आर्थिक दृष्टी से यह कीड़ा अधिक हानिकारक होता है। इस कीडे की सूडिया बैगन के पौधे और फलो को हानि पहुचाती है। ये सूडिया पौधो की तनो और बड़ी पत्तियो के मध्य शिराओ मे घूस जाती है और उन्हे अन्दर ही अन्दर रह्ती है। कीड़ा लगी शाखाएँ झुक जाती है। पौधो पर फल आ जाने पर यह सूडी फलो मे छेद्कर अन्दर ही अन्दर खाती रह्ती है। फलो मे सुराख हो जाते है, जो इस कीड़े के मवाद से भरे रह्ते है।लम्बे बैग्नो की अपेक्षा गोल बैगनो को यह अधिक लगता है। यह कीड़ा अप्रेल मई (गर्मियों) मे सबसे अधिक लगता है। इसकी रोकथाम के लिये पौधो पर 0•25% सेविनामक दवा के घोल का छिड़काव करना चाहिए। 0•8% मेलथीयोन का छिड़काव भी कर सकते है।

3- चेम्पा और हरा तेला – ये दोनो ही छोटे- छोटे कीड़े होते है, जो पत्तियो का रस चुस्ते है । रोकथाम के लिये 1 लीटर metasitox 25 ई सी का 800 – 1000 लीटर पानी मे घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करे।

बैगन की फसल मे होने वाली बीज का उत्पादन (seed production)-

बैगन पर्सेचीत फसल है। इसलिये बीज उत्पादन के समय दो जात्तीयो के बीच की दूरि 100 मीटर होनी चाहिए। बीज बनाने के लिये शरद कालीन फसल अच्छी मानी गयी है। बैगन का बीज प्राप्त करने के लिये बैगन के स्वस्थ व पुर्णरूप से पके फलो को तोड लेना चाहिए। बीजो को निकालकर gudde से अलग करना चाहिए। और उन्हे धोकर, छाया मे सुखा लेना चाहिए।एक हेक्टेयर बीज वाली फसल से 2 क़्विंटल बीज पैदा हो जाता है।