करेले की खेती कैसे करते है करेले की खेती की पूरी जानकारी-(Bitter gourd farming in hindi)-

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करेले का botanical name क्या होता है- Momordica charantia

करेला कौन सी family का होता है- करेला cucurbitaceae फैमिली का होता है।

करेले की खेती सम्पूर्ण भारत मे की जाती है। इसका फल खुरदरी सतह वाला कडवा होता है। इसके फल को सब्जी के रूप मे पकाकर, फ्राई करके करि तथा कलोजी के रूप मे प्रयोग किया जाता है। उच्च पोषक तत्व और औशिधियो गूणो से युक्त होने के कारण इस सब्जी का जन जीवन मे बडा ही मह्त्व है।इसकी सब्जी बल्दायक,कीटनाशक, दस्तावार और उदरशूल को दूर करने वाली है।

करेले की उत्पति कहां हुई _(origin)- करेले का जन्मस्थान अफ्रीका एवं चीन माना जाता है। यह भारत मे जंगली रूप मे भी पाया जाता है।

करेले की खेती के लिये कैसी जलवायु होनी चाहिए (climate for bitter gourd farming in hindi)-

गर्म आद्र जलवायु करेले की खेती के लिये उपयुक्त होती है।

करेले की खेती के लिये भूमि कैसी होनी चाहिए(soil for bitter gourd farming in hindi)- करेले के लिये उत्तम जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी युक्त भूमि सर्वोत्तम होती है।

करेले की खेती के लिये उन्न्त किस्मे कौन कौन सी है – (improved varieties for bitter gourd farming in hindi)-

करेले की किस्मो को आकार के अनुसार दो वर्गो मे बाटा जा सकता है-

1– प्रथम वर्ग के छोटे आकार वाली (10 सेमी तक) जो की प्राय ग्रीष्म ऋतु मे उगायी जाती है ।

2– दुसरे वर्ग के बड़े आकार वाली (10 से 18 सेमी तक)जो की प्राय वर्षा ऋतु मे उगायी जाती है।

करेले की प्रमुख उन्न्त किस्मे निम्न प्रकार की है- पूसा 2 मौसमी, कल्याणपूर, बारामासी, अक्र हरित, कोयेम्ब्टूर लम्बी, hight long, green long, एम बी टी एच -101, एम वी टी एच -102 ।

करेले की कुछ प्रमुख किस्मो का विवरण (description of some important varieties)-

1- पूसा दो मौसमी – यह किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली द्वारा विकसित की गयी है। यह खरिफ और जायद दोनो के लिये उपयुक्त किस्म है। इसकी लता अधिक फैलने वाली, फल मध्यम मोटाई के, हरे और 7-8 सेमी लम्बे होते है। इसके फल लगभग 55 दिन मे तैयार हो जाते हैं इसके प्रत्येक पौधे से औसत 4 से 5 किलो उपज प्राप्त होती है।

2- कल्याणपुर बारामासी (kalyanpur baramasi)- इसका विकास सब्जी अनुसंधान केंद्र कल्याणपुर (उत्तरप्रदेश) से हुआ है। यह खरिफ के लिये उत्तम किस्म है।

3- कोयेम्ब्टूर लम्बी (coembatoor long)- यह किस्म अधिक फैलने व अधिक फलने वाली है। इसके फल लम्बे, मुलायम, सफेद रंग के होते है। यह वर्षा ऋतु के लिये उत्तम किस्म है।

करेले की खेती के लिये भूमि की तैयारी कैसे करते है (Field preparation for bitter gourd farming in hindi)-

कद्दू वर्ग के अन्य फसल के समान ही करेले की फसल के लिये भी भूमि की तैयारी करनी चाहिए। एक बार खेत की मिट्टी पलटने वाले हल से गहरा जोत कर बाद मे 3-4 जोताई देशी हल से करनी चाहिए। प्रतेय्क जोताई के बाद पाटा लगाकर भूमि को भुरभुरी व समतल तैयार कर लेना चाहिए।

करेले की खेती मे कौन कौन से खाद व उर्वरक डालने चाहिए-(Manures and fertilizers for Bitter gourd farming in hindi)-

करेला को तोरई के बराबर खाद एवं उर्वरक देने चाहिए। करेला को 250-300क़्विंटल गोबर तथा कम्पोस्ट खाद तथा 30-40 किलोग्राम nitogen, 25-30 किलोग्राम फास्फोरस और 20-30 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। गोबर की खाद की मात्रा कम होने पर उर्वरको की मात्रा बढा देना चाहिए।गोबर की खाद खेत तैयार करते समय मिट्टी मे मिला देनी चाहिए। nitrogen की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटाश की पूर्ण मात्रा बोते समय तथा nitrogen की बची हुई आधी मात्रा बोने के 1-1/2 माह बाद जड के पास top dressing के रूप मे देनी चाहिए।

करेले की खेती मे बोने का समय क्या होना चाहिए (time of sowing)-

1- मैदानी क्षेत्र के लिये- ग्रीष्म ऋतु के लिये- दिसम्बर से मार्च।

वर्षा ऋतु के लिए- जुन से जुलाई।

2– पहाड़ी क्षेत्र के लिए- मार्च से जुन तक। करेले की खेती के लिए उपयुक्त समय होता है।

करेले की खेती के लिए बीज की मात्रा क्या होनी चाहिये (seed rate for bitter gourd farming in hindi)-

6 से 7•5 किलोग्राम बीज एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है।

करेले की खेती मे बोने का तरीका क्या होता है-(method of sowing bitter gourd farming in hindi)-

करेला को भी लौकी की भाँति क़्यारियो मे , नालियो या गड्ढो मे बोया जाता है। बोन की दूरि निम्न प्रकार रखनी चाहिए-

ग्रीष्म फसल मे- लाईन से लाईन की दूरि-1•5 मीटर।

पौधे से पौधे की दुरी-50 सेमी तक।

वर्षा ऋतु फसल मे- लाईन से लाईन की दरी-2•5मीटर

पौधे से पौधे की दूरी- 60 सेमी तक।

एक स्थान पर 3-4 बीज 3-4 सेमी की गहराई मे बोते है। पौधे उग आने पर एक स्थान पर 1-2स्वस्थ पौधो को बढने देते है, बाकी पौधो को उखाड़ देते है। जायद की फसल मे उपयुक्त अन्तर पर 50 सेमी चौडी 25 से 30 सेमी गहरी नालियाँ बनाते है। नालियों के दोनो किनारो पर 50 से 60 सेमी की दूरी पर बीज बो दिये जाते है।

करेले की खेती मे सिंचाई कैसे ओर किस समय मे करनी चाहिए-(Irrogation of Bitter gourd farming in hindi)-

समय समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए जिससे पौधे पानी की कमी से न मुरझाए। जायद वाली फसल मे प्रति सप्ताह सिंचाई करनी चाहिए । बरसात वाली फसल मे सुखा पडने पर सिंचाई करनी चाहिए।

करेले की खेती मे निराई गूडाई एवं पौधो को सहारा देना (inter culture in bitter gourd farming in hindi)-

जायद वाली फसल मे 2-3 तथा बरसात वाली फसल मे 3 से 4 निराई गूडाई करनी चाहिए। बरसात वाली फसल को सहारा देकर उगाने पर अधिक उपज मिलती है। सहारे के लिए बांस या किसी मजबुत पेड के डन्डे या खूँटे का उपयोग करते है। सहारा देने से फल सडने से बच जाते है। क्युकी फल मिट्टी की सम्पर्क मे नही आ पाते है।

करेले की खेती मे फलो की तोडाई कब की जाती है और उपज कितनी मिलती है-(picking and yield of bitter gourd farming in hindi)-

फलो की तोडाई मुलायम एवं छोटी अवस्था मे ही कर लेनी चाहिए। फल सावधानी से तोडने चाहिए अन्यथा बेल को क्षति पहुचती है । लगातर बेलों से फल लेने के लिए फलो को जल्दी तोड लेना चाहिए और उन्हे बेलों पर पकने नही देना चाहिए।

बरसाती फसल मे गरमी की फसल से अधिक फल लगते है। करेले की उपज 100 से 126 क़्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

करेले के पौधो मे लगने वाले रोग एवं कीट तथा उनसे बचाव के तरीके-( diseases and insect control of bitter gourd in hindi)-

1-रोमिल फन्फुंदी – पत्तियों की उपरी सतह पर पीले, लाल तथा निचली सतह पर बैगनी धब्बे पड़ जाते है इससे प्रभावित होती है, इसके लिए-

1- daiethen एम 0-45 के 0•2% घोल का छिड़काव करना चाहिए।

2- bordex mixture का फसल पर छिडकव करना चाहिए।

2- चूर्णी फन्फ़ुदी- पत्तियॉ एवं तानो पर सफेद धब्बे बन जाते है जो धीरे धीरे बढ़कर उपरी सतह पर सफेद चूर्ण के रूप मे दिखाई देते है, इसके लिए-

1- फसल पर 15-20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर गन्धक का छिड़काव किया जाए

2- कोसान का 0•1/100 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर छिड़काव किया जाए।

3- मोजैक – पत्तियाँ सिकुड जाती है एवं उनकी वृद्घि रुक जाती है इसके लिए-

1- रोगी पौधो को उखाड़कर जला देना चाहिए।

2-अवरोधि जातियाँ उगानी चाहिए।

3- daimecron दवा 25 ग्राम दवा 100 लीटर पानी मे घोलकर छिडकी जाए।

कीट नियंत्रण- 1- लाल किडा- यह लाल रँग की मक्खी होती है, जो अंकुरित पौधो को नष्ट कर देती है इसके लिए- 0•1% रोगोर का छिड़काव करे। सेवीन धूल 15-20 किलोग्राम/हेक्टेयर का छिड़काव करे।

2- एपिलेकना (epilachana)- कीट पर काले गोल धब्बे होते है। बच्चे एवं व्यस्क दोनो ही पत्तियाँ खाते है। इसके लिए इकालाक्स घोल 0•2% का छिड़काव करना चाहिए।

3- माहू(Beetle)- यह कीट पत्तियो का रस चूसता है इसके लिए- 0•1% रोगोर या 0•1% thaiodin का छिड़काव करना चाहिए 

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